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कंटीली तारों से घायल खबर : कश्मीर की सूचनाबंदी – 2

Courtesy : https://baithethaley.blogspot.com/2019/09/2.html

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(एनडब्ल्यूएमआई-एफएससी रिपोर्ट)

गिरफ्तारियां, धमकियाँ और जांच

त्राल से इरफ़ान मलिक पहले पत्रकार थे जिन्हें 5 अगस्त की बंदी के बाद हिरासत में लिया गया। यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें आखिर क्यों हिरासत में लिया गया। एक और पत्रकार क़ाज़ी शिबली को अनंतनाग से बंदी से पहले ही हिरासत में लिया गया था, संभवत: सैन्य बलों की तैनाती के बारे में ट्वीट करने के कारण।

पत्रकारों से पुलिस और जांच अधिकारियों ने कुछ संवेदनशील ख़बरों को लेकर पूछताछ की है और उन पर अपने स्रोत बताने का दबाव भी डाला गया है। कुछ प्रमुख अखबारों के संपादकों को भी दबी जुबां धमकी दी गयी है कि उनसे जांच अधिकारी पूछताछ कर सकते हैं।

दबाव की नीतियां अपनाने का एक और उदाहरण वरिष्ठ अंतर्राष्ट्रीय और प्रतिष्ठित स्वतंत्र राष्ट्रीय मीडिया के साथ काम करने वाले पत्रकारों फ़याज़ बुखारी, एजाज़ हुसैन और नज़ीर मसूदी को प्रताड़ित करने के प्रयास में मौखिक रूप से सरकार की तरफ से दिया गया घर खाली करने को कहा गया है। स्तंभकार और लेखक गोहर गिलानी को 31 अगस्त को विदेश जाने से रोकना, कश्मीरी आवाजों को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पहुँचने से रोकने की ही एक कोशिशों की कड़ी है।

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स्वतन्त्र समाचार जुटाने का कार्य बुरी तरह प्रभावित

लोगों की जारी “हड़ताल” के बीच, जो अधिकारियों के “सब ठीक है” दर्शाने की सारी कोशिष्ण के बावजूद थमने का नाम नहीं ले रही, पत्रकारों को यहाँ अपने करियर की सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उन्हें जानकारी हासिल करने से रोका जा रहा है। उनके पास समाचार जुटाने, पुष्टि करने और जानकारी के सत्यापन के साधन नहीं हैं और यदि वह किसी तरह ऐसा करने में सफल हो भी गए तो समाचार भेजने में भी बड़ी चुनौतियाँ उनके सामने होती हैं। श्रीनगर में जहाँ हालात गंभीर हैं, वहीँ जिलों, ग्रामीण भागों, छोटे शहरों और सीमाई क्षेत्रों, जहाँ सेना का सूचना के प्रवाह पर पूरा कब्ज़ा है, के बारे में और भी कम जानकारी है।

5 अगस्त को अनुच्छेद 370 को हटाने की घोषणा के बाद जहाँ कुछ अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को अपना प्रकाशन स्थगित करना पड़ा था, वहीँ तीन प्रमुख अखबार और छह अन्य छोटे अखबार सिकुड़े संस्करणों में सामने आये, चार से आठ पृष्ठों के, कुछ बिना सम्पादकीय के और कुछ बहुत कम प्रिंट रन तथा अनियमित वितरण के साथ।

बेबाक और जीवन मीडिया स्पेस माने जाने वाली ऑनलाइन समाचार साईट, बंद ही हो गयीं, अखबार और अन्य प्रकाशन अपनी वेबसाइट पर 4 अगस्त, जब इन्टरनेट बंद किया गया, से समाचार नहीं डाल पा रहे।

चुनिन्दा सरकारी अधिकारियों, पुलिस और सुरक्षा बलों को मोबाइल फोन और लैंडलाइन उपलब्ध है। लेकिन नागरिक जिनमें मीडिया के लोग शामिल हैं, के पास यह सुविधाएं नहीं है। सरकार दावा करती है कि जम्मू कश्मीर में 26 हज़ार लैंडलाइन (95 कार्यरत एक्सचेंज के साथ) शुरू किये गए हैं, जिनमें से अधिकांश जम्मू और लद्दाख में हैं। दोनों क्षेत्रों में इन्टरनेट पर प्रतिबन्ध हटाया गया है पर संचार अनियमित ही है।

कश्मीर घाटी में, लैंडलाइन केवल कुछ इलाकों में काम कर रहे हैं और महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रेस एन्क्लेव में जहाँ अधिकांश अखबारों के कार्यालय हैं, काम नहीं कर रहे। प्रशासन का कहना है कि प्रेस एन्क्लेव लाल चौक एक्सचेंज में पड़ता है जहाँ 8000 लाइन है पर चूँकि यह “संवेदनशील” इलाका है और कड़ी सुरक्षा में है, इसलिए सिर्फ प्रेस एन्क्लेव में लैंडलाइन मुहैया कराना संभव नहीं होगा।

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बिलकुल, यह भी साफ़ है कि सरकार संचार पर सम्पूर्ण बंदी निजी टेलिकॉम ऑपरेटर और केबल टीवी सेवा प्रदाताओं को अपनी सेवाएं निलंबित करने का आदेश देकर कर पायी। लेकिन कुछ भी लिखित में नहीं है। चूंकि अधिकांश आबादी मोबाइल फ़ोन अपना चुकी थी, लैंडलाइन न के बराबर थे और इसीलिए संचारबंदी आसानी से लागू की जा सकी।

मीडिया पर नियंत्रण के लिए भी अजीब तरीके अपनाये गए। श्रीनगर में पत्रकारों के लिए 10 अगस्त को एक तारांकित निजी होटल में एक मीडिया सुविधा केंद्र स्थापित किया गया जिसके लिए प्रदेश सरकार ने रोजाना आधार पर किराए के रूप में अच्छा ख़ासा खर्च किया है। इसमें पांच कंप्यूटर, एक बीएसएनएल इन्टरनेट कनेक्शन और एक फ़ोन लाइन है और इसका नियंत्रण सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय से जुड़े सरकारी अधिकारी करते हैं। पत्रकार इन्टरनेट के लिए कतार में रहते हैं ताकि ख़बरें जारी कर सकें और अख़बारों के लिए पेज अपलोड कर सकें। अक्सर वह एक खबर फाइल करने के लिए दिन भर इंतज़ार करते हैं। यदि, और जो अक्सर होता है, मीडिया हाउस ख़बरों के बारे में कोई सवाल या स्पष्टीकरण पूछें तो उनके पास जवाब देने का कोई तरीका नहीं है और इसलिए या तो ख़बरें किनारे रख दी जाती हैं या इस्तेमाल ही नहीं होतीं।

सरकार का टॉपडाउन रवैया प्रशासन के वरिष्ठ सदस्यों के मीडिया सुविधा केंद्र में आयोजित अनियमित प्रेस ब्रीफिंग से झलकता है, जो केवल 10-15 मिनट ही चलती हैं और जिनमें या तो सवाल पूछने ही नहीं दिए जाते या फिर सवालों के जवाब नहीं दिए जाते।

मनोज पंडिता, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और प्रवक्ता से जब पिछले सप्ताह एक दुकानदार को गोली मारे जाने के बारे में पुछा गया तो उन्होंने अपनी टीम के एक सदस्य को बताया कि पत्रकार जिन्हें फॉलोअप चाहिए वह ट्विटर पर विस्तृत जानकारी पा सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासन लगातार कश्मीर पर जानकारी कई सारे ट्विटर हैंडल पर अपडेट करता रहता है। अब यहाँ इस विडंबनात्मक पहलू को नज़रंदाज़ करना मुश्किल ही था कि जिन पत्रकारों के पास इन्टरनेट ही नहीं है उन्हें सोशल मीडिया नेटवर्क से आधिकारिक जानकारी प्राप्त करने को कहा जा रहा था।

बिलकुल, सरकारी प्रवक्ताओं के ट्विटर हैंडल पर गतिविधियाँ बढ़ गयी हैं और इन पर असंख्य समाचारों और बयानों पर प्रतिक्रियाओं समेत मीडिया रिपोर्टिंग की आलोचना देखी जा सकती है। स्पष्ट रूप से यह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पाठकों और दर्शकों के लिए है और उस आबादी की नज़र से परे है जिनकी इन्टरनेट तक पहुँच नहीं है, भले वह आबादी खुद सोशल मीडिया पर विमर्श का विषय है।

कश्मीर से आने वाली ख़बरों में से बहुतायत ऐसे ख़बरों की है जो सरकारी घोषणाओं और इसकी गतिविधियों के बारे में जानकारी पर आधारित हैं। सरकार की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्तियों पर एक नज़र डालते ही इस बात की पुष्टि होती है। खुले स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति के बारे में विज्ञप्ति में यह तथ्य छिपा ही लिया गया कि छात्र अपनी सुरक्षा को लेकर डर के कारण और किसी संकट की स्थिति में स्कूलों और उनके परिजनों के बीच संपर्क की कोई सम्भावना न होने के कारण स्कूलों से दूर ही हैं।

दूसरी एक प्रेस विज्ञप्ति में सरकारी अस्पतालों में किये गए ऑपरेशनों के बारे में विवरण और आंकड़े दिए गए थे पर पैलेट गन के शिकारों की संख्या के बारे में पूछे गए एक पत्रकार के एक सीधे सादे सवाल का प्रधान सचिव रोहित कंसल की 2 सितम्बर की प्रेस ब्रीफिंग में जवाब नहीं दिया गया।

जब कश्मीर के मीडिया संस्थान इन्टरनेट पर बैन हटाने की मांग कर रहे हैं, प्रशासन उन्हें कहता है कि वह मीडिया केंद्र में और कंप्यूटर मुहैया कराने की कोशिश करेगा। पत्रकार ऐसे नियंत्रित हालात में और लगातार निगरानी के तहत काम करने की विडंबना को अच्छी तरह महसूस करते हैं।

पत्रकारों को प्रतिकूल ख़बरों के लिए प्रतिशोधात्मक कार्रवाई का जोखिम भी उठाना पड़ रहा है। जो पुष्ट जानकारी के आधार पर ख़बरें दे रहे हैं, ऐसे पत्रकारों को भी पुलिस उनके स्रोत पूछने के लिए बुला रही है। नतीजतन, अधिकांश पत्रकार, जिनसे हमने बात की, ने बताया कि वह खुद ही जानकारी को सेंसर करने पर मजबूर हैं।

संपादकों ने चिंता व्यक्त की कि वह अपने जिला प्रतिनिधियों और स्ट्रिंगरों, जो उनकी सूचना प्रणाली की रीढ़ हैं, से पिछले एक महीने से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। उनके बारे में कोई जानकारी नहीं है, उन इलाकों और वहां रहने वाले लोगों की तो बात ही छोड़ दीजिये।

जारी सूचनाबंदी का सभी कश्मीरियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बुरा प्रभाव पड़ा है और मीडिया की आज़ादी गंभीर खतरे में है। नागरिकों को जानने के बुनियादी सूचना अधिकार से वंचित किया जा रहा और मीडिया का सच को बिना डर या उपकार के सामने लाने का कार्य खतरे में है।

(जारी)

नोट : रिपोर्ट पत्रकारों लक्ष्मी मूर्ति और गीता शेषु ने लिखी है जो नेटवर्क ऑफ वीमेन इन मीडिया, इंडिया की सदस्य हैं और फ्री स्पीच कलेक्टिव की संपादक हैं। दोनों 30 अगस्त से 3 सितंबर तक कश्मीर में थीं और चार सितंबर यह रिपोर्ट जारी की गई। दोनों संस्थाएं नॉन फंडेड और वालंटियर ड्रिवन हैं। )

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